Wednesday, May 17, 2017

Nepal India Relation (Blockade 2016)

नेपाल–भारत के अद्वितीय सम्बन्ध में कुछ समस्याए“
 

        नेपाल और भारत का सम्बन्ध विश्व के स्वतन्त्र राष्ट्रों में एक अनोखा द्विपक्षीय सम्बन्ध हैं । दरअसल देखा जाए तो दोनो देशों के लोग किसी भी धार्मिक कृत्य पर सङ्कल्प करते वक्त ‘भारतवर्षे’ कहते हैं । इससे यह प्रतीत होता है कि किसी लम्बे अरसे से दोनों देश एकसाथ थे । इस तरह तो राम और सीता, भगवान् गौतम बुद्ध, महाभारतकालीन पाण्डवद्वारा तप किया हुआ स्थान नेपाल होने से भी वैदिक, पौराणिक काल होते हुए आधुनिक काल तक विकसित और अनवरत निकट सम्बन्ध रहा है नेपाल भारत सम्बन्ध । पवित्र गङ्गाजल से सिञ्चित विशाल भारत और हिमालय की गोद में अवस्थित नेपाल का हिन्दुत्व का सम्बन्ध पशुपतिनाथ, मुक्तिनाथ, जानकी मन्दिर से लेकर भारत के जगन्नाथ, विश्वनाथ, सोमनाथ, मुक्तिनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामेश्वर, हरिद्वार, काशी का विशिष्ट सम्बन्ध है, जिसके लिए समय समय पर भारत के धर्माधिकारी शङ्काराचार्य से लेकर राजनीतिक नेता तक नेपाली महाराजा को हिन्दू सम्राट् का दर्जा देने में नहीं झिझकते । भारत जैसा विशालकाय देश, जहा“ संसार में सब से अधिक हिन्दू जनता धार्मिक आस्था से रहते हैं अपने पडोसी छोटे से हिमाली राष्ट्र नेपाल को विश्व का एक ही हिन्दू राष्ट्र है कहने में गर्व महसुस करते हैं, मगर जब नेपाल को कुछ रियायत देने की बात आती है तब भारतीय लोग अपनी सभी धार्मिक निकटताए“ भूल जाते है । वरन नेपाल को उसी दर्जे में रखने में तनिक भी तकलीफ नहीं मानते, जिसमे वे अपने दुश्मनों को रखते हैं । वरना जी.टी.भी. से लेकर इन्डिया टुडे सरिखे सञ्चार माध्यमों का विषवमन किसी भी हालमें अच्छा नहीं लगना चाहिए ।
नेपाल के वर्तमान प्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोइराला इस बार फिर भारत का औपचारिक भ्रमण कर रहे हैं । प्रधानमन्त्री के रूप में अपने पहले भारत भ्रमण के दौरान उन्हों ने महाकाली नदी पर बनी हुई टनकपुर परियोजना को स्वीकृति देने के हेतु भारत के साथ ‘टनकपुर सन्धि’ की थी । उसको लेकर नेपाल में काफी हङ्गामा हुआ था । सदन से लेकर सडक तक लोग उतर गए थे । इतना ही नहीं स्वयम् प्रधानमन्त्री ने भी सम्झौता को ‘समझदारी है सन्धि नहीं है’ कह कर विषय को और जटिल बना दिया था । जब नौबत मुकदमे तक पहु“ची तब नेपाल के सुप्रिम कोर्ट ने उसे ‘सन्धि ही है’ कह कर प्रधानमन्त्री को झुटला दिया । इस बार फिर गिरिजाप्रसाद कोइराला घनिष्टतम पडोसी देश भारत का औपचारिक भ्रमण करने जा रहे हैं । उनको पिछली बार की घटना भी तरोताजा होनी चाहिए और सम्भवतः प्रधानमन्त्री के रूप में यह उनकी भारत की अन्तिम यात्रा होगी । काई नहीं चाहेगा कि अपने देश का इतिहास उन्हें बूरी नजर से देखे । पहली बार तो उन्होनें जनता के सुसूचित होने का अधिकार को कुण्ठित करते हुए सन्धि के बारे में सब कुछ गुप्त रखना चाहा था । इस बार भी उन्होंने पुरानी गलती दुहराई तो नेपाली जनता उनके साथ साथ भारतीय राजनयिकों पर भी विश्वास करना छोड देगी । इससे दोनों देशों के सम्बन्धों में लम्बे अरसे तक अविश्वास पनप सकता है ।
इस बार भारत में पहली बार भाजपाबहुल सरकार दिल्ली में राज कर रही है । वर्तमान प्रधानमन्त्री बाजपेयी सन् १९७७ में तत्कालीन प्रधानमन्त्री मोराजी भाई देशाई के मन्त्रीमण्डल के विदेशमन्त्री रह चुके थे । तब उन्होनें नेपाल का भ्रमण कर पहली बार नेपाल को व्यापार तथा पारवहन सन्धि अलग अलग कर तीसरे देशों के साथ नेपाल का व्यापारिक सम्बन्ध आगे बढाने में सहयोग किया था, लेकिन उस की नवीकरण में ढिलाई होने से नेपाल भारत सम्बन्ध में सन् १९८९ में कुछ समस्याए“ पैदा हो गईं थीं । तब दिनमान (१५ मई) में भाजपा सांसद् एवम् भारत के पूर्व विदेशमन्त्री के नाते त्रिलोक दीप से बातचीत करते हुए नेपाल के प्रति हमदर्दी दिखाई थी । अभी उस को परखने का समय है । दूर से भूतपूर्व विदेशराज्यमन्त्री नटवर सिंह ने उन्हीं सम्वाददाता से टेलिफोन पर कहा था, ‘नेपाल मसले को जनता सरकार ने उलझाया है । हम उसको सुझाने का प्रयास कर रहे हैं । जिस दिन यह उलझन समाप्त हो जाएगी भारत और नेपाल के सम्बन्ध सामान्य हो जायेंगे ।’ उस वक्त भाजपा सांसद् बाजपेयीने इन तर्को को हास्यास्पद बताते हुए कहा था, ‘हमारे समय में तो नेपाल के साथ जिस तरह के सद्भावना पूर्ण सम्बन्ध थे उतने तो और किसी दौर में नहीं रहे ।’
जब बाजपेयी जी ने पूछा कि इस वक्त नेपालका मुद्दा उलझा हुआ है इसे उलझाने के लिए कौन जिम्मेवार है ? तव उन्होने कहा था कि दोनों दोषी हैं । लेकिन मैं भारत सरकारको अधिक दोष देता हु“ क्यों कि भारत बडा है । उसे ऐसी परिस्थिति पैदा नहीं होनी देनी चाहिए थी, जिस से कि नेपाली लोग आवश्यक वस्तुओं के अभाव से बहुत परेशान हो जायें । झगडा दो सरकारों में है, किन्तु नेपाल के लोग उसका दुष्परिणाम भुगत रहे हैं । बाजपेयी जी ने यह भी कहा था कि नेपाल चारों ओर से जमीन से घिरा हुआ है । अतः उसे पारगमन का मार्ग तो मिलाना ही चाहिए । पारगमन नेपाल का अधिकार है । व्यापार दोनों देशों के हितो पर निर्भर करता है । प्रश्न यह है कि नेपाल के साथ हमारा भाइचारे का सम्बन्ध चले कि न चले ?
बाजपेयीजी ने कहा था अगर भारतीय प्रधानमन्त्री यह आशा करते हैं कि नेपाल नरेश उन की अगवानी के लिए आयें तो यह गलत है । नेपाल में प्रधानमन्त्री हैं । प्रधानमन्त्री को प्रधानमन्त्री के तौर पर आदर सत्कार होनी चाहिए । बाजपेयी जी ने उस वक्त जो कुछ कहा था, उस से उनका सद्भाव नेपाल की ओर दीखता है । उन्होंने कहा था सम्बन्ध में जो कटुता आई है इस के लिए मैं भारत सरकार को दोषी मानता हु“, क्योंकि मैं भारत का नागरिक हु“ । मुझे अपनों से शिकायत करने का ज्यादा हक है । उन्होंने आगे कहा था हमारी दृष्टि में तो नेपाल का एक विशेष स्थान है । इसलिए एक दूसरे के नागरिकों के प्रति एक विशेष प्रकारका व्यवहार किया जाता है । नेपाल को यह तय करना होगा कि वह भारत के साथ विशेष सम्बन्ध चाहता है या अन्य तरह के सम्बन्ध दुसरे देशों से नेपाल अपना सम्बन्ध घना करे, हमें इस में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वह घनिष्टता हमारी कीमत पर नहीं होनी चाहिए ।
१७०० किलोमिटर खुली सीमा वाले मित्र होने की बजह से हमारे बीच में छोटीमोटी उलझन होना बडी बात नहीं है । उस को खुले तौर पर बातचीत के जरिए निपटा देना चाहिए । अब वक्त आ गया हैं सांसद् बाजपेयी जी और प्रधानमन्त्री बाजपेयी जी के दृष्टिकोण और व्यवहार में कितनी समानता है, नेपाल के लोग यह जानना चाहते हैं ।
इस बार गिरिजाप्रसाद कोइराला बहुमत प्राप्त पार्टी के कमजोर प्रधानमन्त्री के रूप में भारत भ्रमण कर रहे हैं । वहीं बाजपेयी जी विशाल भारत के मिलीजुली सरकार के शक्तिशाली प्रधानमन्त्री के रूप में हैं, जिन को नेपाल के साथ सद्भाव है और नेपाल की अन्दरुनी राजनीति की भी परख है । ऐसे में नेपाल भारत के सम्बन्ध में कुछ समस्याए“ पैदा करने वाले मसले जैसे भुटानी शरणार्थियों का स्वदेश लौटने में भारत की मद्दत, लक्ष्मणपुर बा“ध के कारण जलमग्न हुए नेपाली गा“व का प्रश्न, कालापानी में भारतीय सैनिकों की उपस्थिति, महाकाली सन्धि को कार्यान्वयन, पञ्चेश्वर डी.पी.आर. एवम् वृहत् पनबिजली परियोजना में भारतीय दृष्टिकोण और रुझान, नेपाल में पनप रहे आतङ्कवाद, माओवादी कार्यकर्ताओं का दिल्ली में प्रदर्शन और पनाह जैसे कुछ मुद्दो के साथ नेपाल के प्रधानमन्त्री दिल्ली में बात करना चाहेंगे और लाजमी भी होगा । उधर भारत भी आई.एस.आई. को नेपाल में पनाह मिलने की बात करता आ रहा है । वह इस मुद्दे के साथ साथ नेपाल मे आतङ्कवादी के सम्बन्ध एवम् बृहत सुरक्षा अवधारणा के बारे में बातचीत करना चाहेगा । तभी सद्भाव आगे बढाने पर विश्व का हिन्दूबहुल भारत और एक ही हिन्दू राष्ट्र नेपाल एक दूसरे को मित्र समझकर छोटी छोटी उलझनों में उलझने की जगह मित्रवत् व्यवहार करेंगे तो बहुत कुछ समस्याओं का निदान हो सकता है । नेपाल और भारत सरकार को एक दूसरे के हित में समान दृष्टिकोण रखना चाहिए । एक का हित दूसरे का भी हित है समझ कर राजनीतिक और कूटनीतिक सम्बन्धों को आगे बढाया जाय तो छोटीमोटी समस्याए“ खुद बखुद सुलझ जायेगी ।
विहारमे आने वाला बाढ का पानी विस्थापित लोगों को नेपाल तक पहु“चाता है तो दूसरी ओर नेपाल में प्राकृतिक प्रकोप और आर्थिक मन्दी से सङ्कटग्रस्त नेपाली जनता भारत मे ही पनाह पाती है । अतः दोनो प्रजातान्त्रिक राष्ट्रों के सरकार प्रमुखों को पडोसियों के साथ आनेवाले समस्याओं को समाधार कर सन् १९५० के सन्धि के तहत सम्बन्ध प्रगाढ करना चाहिए । अन्यथा जरुरी हो तो सोच समझ कर राणा प्रधानमन्त्री मोहन शमशेर के साथ की गई ‘शान्ति और मैत्री सन्धि’ को समयानुकूल पुनरवलोकन कर अन्तर्राष्ट्रिय कायदे कानुन के मुताबिक आगे बढाना चाहिए । मेरे ख्याल में भौगोलिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक सभी दृष्टियों से भी इस पर विचार करना उचित होगा । नेपाल में चल रही धर्मान्तरण भी भारत और नेपाल का सरदर्द का कारण होना चाहिए । इस के लिए इसाई और इस्लाम दोनो संस्थाए“ नेपालमे सक्रिय हैं । भाजपा सरकार से नेपाली जनता सम्बन्ध सुधार की आशा करती है । भारत नेपाल के साथ के सम्बन्ध को कितना महŒव देता है वह इस बात से जाहिर होता है कि प्रजातन्त्र प्राप्ति के पचास साल बाद भारत की स्वतन्त्रता की पचासवीं वर्षगा“ठ (स्वर्ण जयन्ती) पर गणतन्त्र भारत ने नेपाल के महाराजाधिराजको २६ जनवरी के अवसर पर प्रमुख अतिथि के रूप में आमन्त्रण किया था । इस से दोनों के सम्बन्धों का उच्चतम मूल्याङ्कन होता है ।

– नवभारत टाइम्समा प्रकाशनार्थ दिइएको तर नछापिएका

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